नोटबंदी के बाद टूटेगा मोदी का ये बड़ा सपना ? विपक्ष भी उठा रहा सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नोटबंदी की घोषणा के बाद अब तक आम जन को कोई राहत नहीं मिली है। नोटबंदी को महीना होने को है लेकिन बैंकों और एटीएम के बाहर कतारें कम नहीं हुई हैं और न ही बैंकों में कैश है। ऐसे में मोदी का एक बड़ा सपना टूट सकता है। मोदी आने वाले दिनों में भारतीय समाज और बाजार के लिए एक सपना देख रहे हैं। यकीनन ये सपना सुदूर भविष्‍य की दुनिया है लेकिन इसके साकार होने का सफर आसान नहीं है। मोदी का सपना भारत को कैशलैस बनाने का है ताकि काले धन पर लगाम कसी जा सके। नोटबंदी के बाद लोगों को खासी परेशानी हो रही है तो एक दम से कैशलैस के फैसले से कई परेशानियां खड़ी हो सकती हैं। इसलिए विपक्ष भी सरकार की खिल्ली उड़ा रहा है और मोदी के सपने के टूटने की भविष्यवाणी की जा रही है। हालांकि सरकार देश के हालात से वाकिफ है लेकिन मोदी इस ओर अग्रसर हो रहे हैं।

ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था को किया गया नजरअंदाज
विपक्ष का आरोप है कि नोटबंदी के फैसला ने देश की ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था की कमर तोड़ दी है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नजरअंदाज कर ही नोटबंदी का फैसला लिया गया है, जहां निरक्षरता तो चरम पर है ही बल्‍कि भुखमरी, गरीबी, अशिक्षा भी बहुत है। देश की 125 करोड़ की आबादी में से अधिकतर लोग गरीब और अशिक्षित हैं, जिनके लिए कैशलेस लेन-देन की बात बेमानी है। उन्हें कैशलैस की आदत डालने से पहले शिक्षित करना पड़ेगा जो अपने आप में एक बड़ा काम है। देश की एक बड़ी आबादी को शिक्षित करने के बाद समस्या यहीं खत्म नहीं होती, बल्कि देश के कई क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाएं भी नहीं हैं, वहां नकदी रहित लेनदेन सोचना बेमानी ही होगा।

अमेरिका पूर्ण कैशलैस नहीं
नोटबंदी का फैसला लेकर मोदी ने वर्तमान अर्थव्‍यवस्‍था से 1000 और 500 रुपए की 80 फीसदी से ज्‍यादा मुद्रा हटा दी है। बाजार में कैश की किल्‍लत है और ऐसे में सरकार ने देश में कैशलैस सोसायटी की बहस को जन्‍म दे दिया है। देखा जाए तो अमेरिका जैसा देश अभी भी पूर्ण रूप से कैशलेस नहीं हो पाया है तो ऐसे में भारत को पूरी तरह से कैशलेस बनाने का दावा कितना कारगर साबित होगा? ये तो आने वाला समय ही बताएगा।

इस संबंधी कई विशेषज्ञों ने अपनी राय दी
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सहायक कुलसचिव प्रोफेसर शार्दुल चौबे का कहना है कि हम अभी 3जी, 4जी पर ही अटके हुए हैं, ऐसे में देश को डिजिटल बनने में कम से कम 10 से 15 साल लग सकते हैं।
-अर्थशास्त्री नितिन पंत कहते हैं के मुताबिक देश के जिस एक तबके को स्मार्टफोन चलाना तक नहीं आता उनके लिए ई-बैंकिंग की डगर बहुत कठिन है। देश के 70 करोड़ लोगों के पास ही बैंक खाता है इनमें से 24 करोड़ खाते पिछले एक साल में प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत खुले हैं और वे इसे लेकर कितने सजग है यह भी सोचने वाली बात है।

ऐसे में मोदी का कैशलेस सोसायटी का सपना कैसे पूरा होगा इस पर उनको पहले गहन विचार करना पड़ेगा। वैसे भी कई बार अच्‍छे फैसले आलोचना के केंद्र में होते हैं। यकीनन डिजिटल मनी और ऑन लाइन ट्रांजेक्‍शन को बढ़ावा देना अच्‍छी बात है लेकिन इस पर पहले से तैयारी करनी भी जरूरी होगी क्योंकि नोटबंदी पर आचानक लिए के फैसले के बाद मोदी को वपक्ष का विरोध झेलना पड़ रहा है।
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